Thu. Apr 18th, 2024
वीडियो एडिटिंग ,फोटो एडिटिंग के बाद अब आया जीन एडिटिंगवीडियो एडिटिंग ,फोटो एडिटिंग के बाद अब आया जीन एडिटिंग

अपने तो वीडियो एडिटिंग , फोटो एडिटिंग , वौइस् एडिटिंग जैसी कई एडिटिंग के बारे में सुना होगा लेकिन क्या आपने जीन एडिटिंग के बारे में सुना है ?आपको बता दें देश में शोध-अनुसंधान को प्रोत्साहित करने पर सरकार का विशेष ध्यान है। आइआइटी जैसे संस्थानों के साथ विश्वविद्यावलयों के स्तर पर भी शोध कार्य बढ़ाने पर जोर है। इसी क्रम में हिसार के गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में एक अहम शोध किया गया है जिससे मच्छरों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने की राह खुली है। मलेरिया व डेंगू जैसी बीमारियों को कम किया जा सकेगा। विश्वविद्यालय के माइक्रोबायोलाजी विभाग में हुए शोध में क्रिस्पर तकनीक यानी जीन एडिटिंग का प्रयोग किया गया है। शोध को अमेरिका के प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल प्लोस वन ने प्रकाशित किया है। जीन एडिटिंग का उपयोग किसी जीव-जंतु के जीन में परिवर्तन करने के लिए किया जाता है। यह शोध में माइक्रोबायोलाजी विभाग की डा. ज्योति ने किया है। शोध के अनुसार इसी तकनीक के माध्यम से मच्छरों में प्रजनन क्षमता प्रभावित करने वाले ट्रांसफेरिन प्रोटीन को कम किया जा सकेगा। इससे मच्छरों की पीढ़ी दर-पीढ़ी आबादी कम होगी। शोध के लिए डा. ज्योति को एसोसिएशन आफ माइक्रोबायोलाजिस्ट्स ने यंग साइंटिस्ट का पुरस्कार दिया है। डा. ज्योति ने आइसीएमआर से जुड़े दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मलेरिया संस्थान की प्रयोगशाला में दो वर्ष में यह शोध पूरा किया। इसमें उन्होंने मच्छरों की पांच पीढ़ियों का अध्ययन किया। उन्होंने यह शोध गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बायो एंड नैनो विभाग की डा. नमिता और राष्ट्रीय मलेरिया संस्थान की डा. रजनीकांत दीक्षिता के निर्देशन में पूरा किया।

शोध में पता चला कि मच्छरों में ट्रांसफेरिन प्रोटीन पाया जाता है जो उनकी प्रजनन क्षमता को घटाता व बढ़ाता है। जीन एडिटिंग से मच्छरों में अंडे देने की क्षमता को कम करने को डीएनए में ट्रांसफेरिन प्रोटीन को चार गुना तक कम किया गया। डा. ज्योति बताती हैं कि ट्रांसफेरिन प्रोटीन कम करने के लिए मच्छर एंटी डोट बनाकर इंजेक्शन से दी गई। इसके लिए मच्छरों को कोल्ड एनीस्थीसिया देकर बेहोश किया गया। कुछ समय बाद मच्छरों के शरीर से राइबो न्यूक्लिक एसिड निकालकर चेक किया गया कि ट्रांसफेरिन प्रोटीन कम हुआ है या नहीं। इसमें अपेक्षित परिणाम मिले। डा. नमिता बताती है कि यह शोध कारगर रहा है। इसे वृहद स्तर प्रयोग के लिए राष्ट्रीय मलेरिया संस्थान से वार्ता चल रही है। मादा मच्छर करीब 150 अंडे देती है, लेकिन ट्रांसफेरिन प्रोटीन कम करने पर महज 30-40 अंडे ही दिए। कुछ ने तो सात अंडे ही दिए। इस तकनीक में बड़ी संख्या में मच्छरों में ट्रांसफेरिन प्रोटीन कम किया जाएगा जिससे मच्छरों की संख्या में कमी आती जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *