Wed. Feb 21st, 2024
इस अद्भूत कहानी में, लोगों ने अपने आत्मनिर्भरता, सहनशीलता, और आपसी मदद के माध्यम से जीवन की रक्षा करने का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।इस अद्भूत कहानी में, लोगों ने अपने आत्मनिर्भरता, सहनशीलता, और आपसी मदद के माध्यम से जीवन की रक्षा करने का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

13 अक्टूबर 1972 की दोपहर को उरुग्वे वायु सेना की फ्लाइट 571 चिली के लिए उड़ान भरती है | मौसम एक सामान्य था और फ्लाइट भी | इस विमान में 45 यात्रियों में उरुग्वे की एक लोकल रग्बी टीम के खिलाड़ी भी सवार थे और सब चिली की ओर जा रहे थें | अचानक मौसम बिगड़ता है और 12 अक्टूबर को फ्लाइट 571 को उरुग्वे और चिली के बीच में एक देश जिसको हम अर्जेंटीना के नाम से जानते हैं वहाँ पर इमरजेंसी लैडिंग करनी पड़ जाता है | अगले दिन यानी 13 अक्टूबर को फ्लाइट 571 फिर से उड़ान भरती है | दोपहर 3 बजकर 21 मिनट पर प्लेन अर्जेंटीना और चिली के बॉर्डर के ऊपर से उड़ रहा था | नीचे एंडीज़ की खूबसूरत पहाड़ियां थीं | जो बारहों महीने बर्फ से ढकी रहती हैं और यह अमेरिकी महाद्वीप की सबसे लम्बी पर्वत श्रृंखला भी हैं | मौसम साफ़ था और सब कुछ सही चल रहा था लेकिन फिर पायलट से एक बड़ी गलती हो गई |

प्लेन में बैठी रग्बी टीम में डॉक्टर रॉबर्ट केनेसा भी शामिल थे जो एक रग्बी के प्लेयर भी थे | केनेसा ने नेशनल जियोग्राफिक को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि प्लेन अचानक नीचे की ओर जाता महसूस हुआ | कुछ देर बाद उनके बगल में बैठा एक यात्री बोला, “क्या तुम्हें नहीं लगता प्लेन पहाड़ की चोटियों से कुछ ज्यादा ही नजदीक उड़ रहा है?” उस यात्री की आशंका एकदम सही थी | जब तक कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही प्लेन तेज़ी से नीचे की ओर गिरने लगा | पूरे प्लेन में चीख पुकार मच गई | डॉक्टर केनेसा को लगा, ये शायद उनकी जिंदगी का आख़िरी दिन है | प्लेन क्रैश कर रहा था और केनेसा बेबस थे | कोई कुछ कर सकता था, तो वो था प्लेन का पायलट | लेकिन असलियत में सारी गलती वहीं से शुरू हुई थी |

एक गलतफहमी के चलते पायलट को लगा कि वो एयरपोर्ट से एकदम नजदीक है | जबकि डेस्टिनेशन अभी 60 किलोमीटर दूर था. इस चक्कर में प्लेन जिस ऊंचाई पर उड़ रहा था, पायलट वहां से काफी नीचे ले आया, एंडीज़ की पहाड़ियों के एकदम नजदीक. जब पायलट को अपनी गलती का अहसास हुआ, उसने प्लेन को दुबारा ऊपर ले जाने की कोशिश की | लेकिन इसी चक्कर में प्लेन स्टाल कर गया और सीधे नीचे की ओर गिरने लगा | प्लेन का बायां पंख एक पहाड़ी से टकराया और उसके परखच्चे उड़ गए | इसके बाद प्लेन पहाड़ी पर फिसलता हुआ सीधे जाकर एक ग्लेशियर से टकराया | पंख और टेल दोनों टूट चुके थे | सिर्फ प्लेन की बॉडी यानी फ्यूसलाज़ बचा था | 12 लोग प्लेन क्रैश के दौरान मारे गए थे | जो बचे थे, उनके सामने थी एक बड़ी चुनौती |

चारों तरफ सिर्फ बर्फ की बर्फ और कोइ सहारा नहीं | सिर्फ एक ही उम्मीद थी और वो थी बचाव दल | क्योंकि ऐसे में बचाव दल सिर्फ हेलीकॉप्टर से उन तक पहुंच सकता था | बचाव दल के आने तक जरूरी था कि वो लोग अपनी जान बचाने का इंतज़ाम करें | सबसे जरूरी था खाने का इंतज़ाम | एंडीज़ की पहाड़ियों में न कोई हरियाली थी, न कोई जानवर ऐसे में उन्होंने प्लेन से जो कुछ मिला उसे इकट्ठा कर लिया | इसके अलावा उन लोगों ने सूटकेस इकठ्ठा किए | उनसे बर्फ में एक क्रॉस बनाया. साथ ही SOS का निशान बनाया ताकि ऊपर से यदि कोई प्लेन गुजरे तो देख ले | इसके बाद वो बचाव दल का इंतज़ार करने लगे | एक दिन गुजरा दो दिन गुजरे, तीन दिन गुजर गए | इस बीच में कई प्लेन उनके ऊपर से गुजरे, लेकिन मदद कहीं से नहीं आई | सफ़ेद बर्फ में प्लेन का सफ़ेद फ्यूसलाज़ किसी को नहीं दिखा | इस बीच एक और आफत खड़ी हुई | खाना ख़त्म होने लगा | कई लोग चोटिल थे, उन्हें ताकत देनी जरूरी थी. पानी तो धूप में बर्फ के टुकड़े पिघला कर मिल गया, लेकिन खाने का कोई जरिया नहीं था | जब कई दिन बाद भूख सहन नहीं हुई, तो आखिर में उन्होंने वो चुनाव किया, जिसे इंसानी समाज में सबसे बड़ा टैबू माना जाता है |

प्लेन में मारे गए लोगों की लाशें पास ही बर्फ में दबी हुई थीं | किसी ने आइडिया दिया कि उन लोगों का मांस खाया जा सकता है | लेकिन इंसानी मांस सुनते ही सबके मन में सिहरन दौड़ गई | खासकर तब जब ये लाशें उनके अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की थीं | हालांकि जान बचाने का कोई और रास्ता नहीं था | इसलिए उन लोगों ने आपस में बात कर एक-दूसरे से एक वायदा किया | वायदा ये कि अगर किसी की मौत हो गई, तो वो व्यक्ति भी यही चाहेगा कि दूसरे लोग उसका मांस खाकर अपनी जान बचाएं | अंत में यही किया गया | मारे गए लोगों का कच्चा मांस खाकर उन्होंने खुद को जिन्दा रखा | हालांकि मुसीबत दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी | घटना के कुछ रोज़ बाद ग्रुप के कुछ लोग एक हिमस्खलन की चपेट में आ गए | और 17 लोगों की मौत हो गई | कुछ दिन बाद एक और शख्स चोट से मारा गया |

प्लेन से बचे हुए लोगों को पहाड़ी पर 70 से ज्यादा दिन हो चुके थे | इस बीच कई लोगों की और मौत हुईं और अंत में महज 16 लोग बचे | इन लोगों के जिंदा बचे रहने का अब सिर्फ एक रास्ता था | उनमें से कोई पहाड़ से बाहर जाने का रास्ता तलाशे और मदद लाने की कोशिश करे | काफी बहस के बाद तीन लोगों ने इस काम का बीड़ा उठाया और वो तीन लोग नंदो पराडो, अंतोनियो टिनटिन और रॉबर्ट केनेसा थें | तीनों ने खाने का कुछ सामान लिया और सफर पर निकल पड़े | उनके पास पहाड़ चढ़ने के उपकरण नहीं थे और न ही बर्फ पर चलने के जरूरी साजो सामान | प्लेन के टुकड़ों से जुगाड़ बनाकर उन्होंने कुछ जूते बनाए थे ताकि बर्फ पर चल सकें और उन्हें पहाड़ चढ़ने में सफलता भी मिली |

पहाड़ के दूसरी तरफ उन्होंने 10 दिनों तक पैदल दूरी पार की और 63 किलोमीटर की दूरी चलने के बाद दोनों में ताकत का एक कतरा नहीं बचा था | दोनों निढाल होकर वहीं लेट गए | आंखें बंद कर ली | तभी एक आवाज आई उम्मीद की आवाज | दोनों को किसी घोड़े के टापों की आवाज सुनाई दी | आंखें खोली तो दोनों ने देखा घोड़े के साथ एक आदमी भी है | वो उसकी भाषा नहीं जानते थे | लेकिन फिर भी किसी तरह उन्होंने उसे समझाया कि उन्हें मदद की जरूरत है | उस आदमी ने जाकर अधिकारियों को ये बात बताई | तुरंत एक हेलीकॉप्टर रवाना किया गया और 16 लोगों को बचा लिया गया | इस घटना के कई बरस बीत जाने के बाद भी यह घटना भुलाई नहीं जा सकती है |

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