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रविवार, अगस्त 1, 2021

कहां है देश का सबसे ऊंचा बांध, सुरक्षा की दृष्टि से काफी अहम है टिहरी बांध

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देश के सबसे ऊंचे बांध का जिक्र छिड़ते ही टिहरी का नाम सामने आता है। 260.5 मीटर ऊंचा यह बांध सिर्फ उत्तराखंड नहीं बल्कि देश के कई राज्यों को रोशन कर रहा है। दिल्ली और यूपी के कुछ क्षेत्रों में बांध के जल का इस्तेमाल पेयजल और सिंचाई के लिए भी किया जाता है। वहीं सुरक्षा की दृष्टि से भी यह बांध काफी अहम माना जाता है। हालांकि कहते हैं कि विकास अपने साथ-साथ कुछ दुष्परिणाम भी लाता है। इस बांध के भी कई नुकसान हैं। कई बार खतरा भी मंडराता रहा है।

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पहले जान लीजिए इस बांध की खासियत-


1- 1972 में निर्माण, 2006 में शुरू हुआ उत्पादन
टिहरी बांध उत्तराखंड के टिहरी जिले में बना है। साल 1972 में टिहरी बांध के निर्माण को मंजूरी मिली थी और 1977-78 में बांध का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। 29 अक्टूबर 2005 को टिहरी बांध की आखिरी सुरंग बंद हुई और झील बननी शुरू हुई। जुलाई 2006 में टिहरी बांध से विद्युत उत्पादन शुरू हुआ।

2- पत्थर और मिट्टी से बनी हैं बांध की दीवारें
चूंकि टिहरी जिला उच्च तीव्रता वाले भूकंप जोन का क्षेत्र है इसलिए नुकसान को रोकने के लिए टिहरी बांध को रॉकफिल बनाया गया। इसके लिए टिहरी बांध की दीवार को पूरी तरह पत्थर और मिट्टी से भरकर बनाया गया। इस बांध में भागीरथी और भिलंगना नदी का पानी इकट्ठा होता है।

3- दिल्ली और यूपी को पेयजल उपलब्ध कराता है बांध
फिलहाल यह बांध एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करता है और वहीं 400 मेगावाट बिजली का उत्पादन कोटेश्वर बांध से होता है। इस बांध की ऊंचाई 260.5 है। वहीं इसका जलाशय 42 वर्ग किमी लंबा है। टिहरी बांध से हर दिन 2,70,000 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई और 102.20 करोड़ पेयजल दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड को उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

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4- 2400 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य
एक हजार मेगावाट उत्पादन के लिए अभी पंप स्टोरेज प्लांट का काम किया जा रहा है। इसका काम पूरा होने के बाद टिहरी बांध पूर्ण रूप से चालू हो सकेगा और 2400 मेगावाट का बिजली उत्पादन हो सकेगा।

5- बांध के निर्माण में डूबे थे 37 गांव
इस जल विद्युत परियोजना के लिए पुराने टिहरी शहर को जलमग्न होना पड़ा था। इसमें 125 गांवों पर असर पड़ा था। इस दौरान 37 गांव पूर्ण रूप से डूब गए थे जबकि 88 गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए थे। इन इलाकों में रहने वाले लोगों को नई टिहरी और देहरादून के आस-पास के क्षेत्रों में विस्थापित किया गया था।

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6- बांध की है तीन इकाइयां
टिहरी बांध की तीन इकाइयां हैं। पहली 1000 मेगावाट वाली टिहरी बांध इकाई, दूसरी 400 मेगावाट वाली कोटेश्वर जल विद्युत परियोजना इकाई और तीसरी 1000 मेगावाट टिहरी पंप स्टोरेज परियोजना इकाई जो अभी निर्माणाधीन है।

7-टिहरी बांध एक नजर में
टिहरी बांध का झील क्षेत्र 42 वर्ग किमी लंबा है। जबकि बांध दीवार की शीर्ष पर लंबाई 575 मीटर है। बांध दीवार की शीर्ष पर चौड़ाई 25.5 मीटर से 30.5 मीटर तक फैलाव है। बांध दीवार की तल पर चौड़ाई 1125 मीटर है।



8- हर साल होता है 2000 करोड़ रुपये का फायदा
डैम के निर्माण से उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में आने वाली बाढ़ से कमी आई है। वहीं टिहरी डैम में बिजली उत्पादन से देश को हर साल 2000 करोड़ रुपये का फायदा होता है।

9- उच्च तीव्रता भूकंप झेलने की क्षमता
सुरक्षा की दृष्टि से यह डैम काफी अहम माना जाता है। कहा जाता है कि 8 रिक्टर स्केल तक का भूकंप यह बांध झेल सकता है लेकिन कभी इसके अधिक का भूकंप आया तो परिणाम भयानक होंगे।

10- रोम की संस्था की चेतावनी को किया दरकिनार
बांध के निर्माण के समय स्थानीय लोगों ने विरोध किया था। इस परियोजना को मंजूर कराने के लिए तत्कालीन सरकार ने रोम स्थित भूकंप मापने संबंधी स्वतंत्र एजेंसी आइएपीजी की चेतावनी को भी दरकिनार कर दिया था।

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अगर टिहरी डैम टूटता है कौन-कौन से शहर डूबेंगे!
उच्च भूकंप जोन वाले क्षेत्र में बना हुआ है। टिहरी बांध अगर किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के चलते यह डैम टूटा तो पश्चिम बंगाल तक असर देखे जाने की आशंका है। सबसे ज्यादा असर ऋषिकेश और हरिद्वार में पड़ सकता है। इन शहरों के पानी में डूबने की आशंका है। इसके बाद पश्चिमी यूपी के जिले बिजनौर, मेरठ, हापुड़ और बुलंदशहर में इसका असर देखने को मिल सकता है। यहां 10 मीटर पानी भरने की आशंका है।

हैदराबाद स्थित नैशनल जीयोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट ने एक शोध के अनुसार, टिहरी बांध मध्य हिमालयी फाल्ट (दरार) पर है। यह दरार तिब्बती प्लेट से बनी है। ये प्लेट भारत को लगातार एक सदी के अंतराल में दक्षिण की ओर धकेल रही है। टिहरी बांध को 1972 में बनाया गया। तब तक हिमालय के विघटन की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। तब इस बांध को इसी आधार पर डिजाइन किया गया था कि इस क्षेत्र में 7.2 रिक्टर स्केल से अधिक का भूकंप आ ही नहीं सकता। लेकिन लेकिन बाद के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि यहां 8.5 रिक्टर स्केल का भी भूकंप आ सकता है जो इस क्षेत्र के लिए भयानक हो सकता है।

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