बिहार के भागलपुर का ‘अंखफोड़वा कांड’ आज भी लोगों के जेहन में है जीवंत

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बिहार के भागलपुर में 1979 से 1980 के बीच दिल दहला देने वाला ‘अंखफोड़वा कांड’  आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है..भागलपुर के ऐसे लोग जो घटना के साक्षी हैं या जिसने घटना को करीब से जाना है आज भी वह घटना के चर्चा मात्र से ही कुछ पल के लिए सिहर जाते हैं…वहीं बर्बरता का प्रतीक बने पुलिसिया कानून ‘अंखफोड़वा कांड’ के 40 साल बाद भी इसके पीड़ितों के लिए पुनर्वास की पूरी व्यवस्था नहीं हो पाई है….

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 18 पीड़ितों का मिलने वाली पेंशन भी बंद हो चुकी है….पिछले साल नवंबर 2019 से पीड़ितों की पेंशन बंद है…..’अंखफोड़वा कांड’ में पीड़ितों के लिए अधिवक्ता रामकुमार मिश्रा 1980 से निःशुल्क लड़ाई लड़ रहे हैं…उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में पीड़ितों के पुनर्वास की व्यवस्था के लिए ऑनलाइन अर्जी दाखिल की है। इसके साथ ही उन्होंने पुनर्वास के लिए सरकार के उदासीन रवैये से न्यायालय को अवगत भी कराया। भागलपुर में ‘अंखफोड़वा कांड’ के एक पीड़ित ततारपुर थाना क्षेत्र के कंपनीबाग में रहते हैं।

उनका हाल इन दिनों काफी बदतर है। घर भी किसी तरह अपने स्थान पर टिका हुआ है। लेकिन यह कच्चा मकान कब जमींदोज हो जाए किसी को कुछ नहीं पता। इस बीच पीड़ित के भतीजा जीतन मंडल से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि पीड़ित बांका से आ रहे थे। इसी दौरान रास्ते में ही उनकी पुलिस के जवानों से कहासुनी हो गई। फिर क्या था जिले में ‘ऑपरेशन गंगाजल’ का माहौल था। लगे हाथ उन्हें अपराधी बता कर गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी आंखों में तेजाब डालकर उनके रोशनी को सदा के लिए छीन लिया गया। इसके बाद उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं आया। सरकारी मदद भी हाथी का दांत निकला। उन्हें ना पेंशन मिली और ना ही पुनर्वास की सुविधा। भोजन के नाम पर उन्हें परिजन और अन्य पड़ोसी खाने-पीने की व्यवस्था कर देते हैं। जिससे किसी तरह उनका जीवन-बसर हो जाता है। ‘अंखफोड़वा कांड’ की घटना उस समय की है, जब भागलपुर में अपराध अपने चरम पर था। अपराधी वारदातों को अंजाम देने के लिए रात का इंतजार नहीं करते थे। इसे रोक पाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही थी। सरेआम अपहरण, हत्या, लूट, बलात्कार जैसी घटनाएं बाहुबलियों के लिए दिनचर्या बन गई थी। पुलिस अपराधियों को गिरफ्तार करते थे लेकिन सबूत के अभाव में वो अविलंब बरी हो जाते थे। क्षेत्र में दहशत भी इतनी थी कि कोई भी अपराधियों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत तक नहीं करता था। इस बीच भागलपुर पुलिस ने एसपी बीडी राम के रहते अपराध को रोकने के लिए एक गुप्त तरीके से ‘ऑपरेशन गंगाजल’ चलाया। पुलिस महकमे में ‘अंखफोड़वा कांड’ का गुप्त नाम ‘ऑपरेशन गंगाजल’ रखा गया था। इस दौरान सबसे पहले भागलपुर के नवगछिया में नामजद तकरीबन सभी अपराधियों के आंखों में मोटी सुई चुभो के तेजाब डाला गया था। इसके बाद भागलपुर के अन्य थानों में भी ‘ऑपरेशन गंगाजल’ लगभग शुरू हो गया। करीब 2 साल के अंदर 33 अपराधियों को ऐसी बर्बरतापूर्ण सजा दी गई थी।

वहीं तेजाब डालने की अधिकांश घटना रजौन थाना में हुई थी। वर्तमान में रजौन थाना बांका जिले में है। कालांतर में बांका भागलपुर के अनुमंडलीय प्रशासनिक इकाई के रूप में था। 21 फरवरी 1991 में बांका जिला के रूप भागलपुर से अलग होकर अस्तित्व में आया। भागलपुर में 1979 से 1980 के बीच ‘ऑपरेशन गंगाजल’ यानी कि अंखफोड़वा कांड में पुलिस वालों ने बदमाश बता कर 33 लोगों की आंख फोड़कर उसमें तेजाब डाल दिया था। पुलिस के क्रूरता का शिकार हुए 33 में से 13 पीड़ितों की मृत्यु इलाज के अभाव में उसी समय हो गई थी। इसमें कई लोग निश्चित रूप से निर्दोष भी थे। ‘अंखफोड़वा कांड’ में अपनी आंखों की रोशनी को गंवाने वालों में नंदलाल गोस्वामी, श्रीनिवास टीयर, अर्जुन गोस्वामी, बशीर मियां, मांगन मियां, अनिल यादव के नाम शामिल हैं। इनके अलावा शालिग्राम तांती, रामस्वरूप मंडल, मंटू हरि, लखन मंडल, पटेल साह, बलजीत सिंह भी हैं। देवराज खतरी, भोला चौधरी, चमकलाल यादव, पवन सिंह, शालिग्राम साह, उमेश यादव, सहदेव दास, शंकर तांती, शैलेश तांती, सहदेव दास, वसीम मियां, सल्लो बेलदार, कमल तांती, सुरेश साह, रमन बिंद समेत कुल 33 लोग शामिल हैं। भागलपुर में ‘अंखफोड़वा कांड’ के बाद इस पर आधारित प्रकाश झा के निर्देशन में अजय देवगन की अभिनीत चर्चित फिल्म ‘गंगाजल’ ने काफी सुर्खियां बटोरीं। फिल्म वैसे तो बिहार के भागलपुर से जुड़ा हुई थी, लेकिन इसे दुनिया में हर जगह पसंद किया गया। इसके मशहूर डायलॉग ‘आंख दिखाता है…. आंख में तेजाब डालने वाली घटना से ही जुड़ी हुई है। उस दौरान की घटना जिन्हें पता नहीं है, वो भी फिल्म देखने के बाद उस हृदय विदारक घटना से हिल जाते हैं।…ब्यूरो रिपोर्ट माय भारत