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रविवार, अक्टूबर 17, 2021

बिहार में तेजस्वी यादव को टक्कर देने की तैयारी, बीजेपी ने खेला यादव कार्ड, तार किशोर यादव को डिप्टी सीएम बनाने की तैयारी

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पटना. कटिहार से चौथी बार निर्वाचित विधायक तारकिशोर प्रसाद को बीजेपी विधानमंडल दल का नेता और बेतिया से विधायक रेणु देवी को उपनेता चुना गया है। संभावना जताई जा रही है कि तारकिशोर प्रसाद को ही बिहार में अगला उपमुख्यमंत्री भी बनाया जाए। इससे पहले लोकसभा चुनाव के ठीक बाद करीब डेढ़ साल भर पहले संजय जायसवाल को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी में करीब-करीब एक ही समाज वैश्य से इतने लोगों को जिम्मेदारी वाला पद देने के पीछे क्या मकसद हो सकता है इसका अनुमान लगाया जाना शुरू हो गया है। बीजेपी बिहार में किस किस्म की राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है इसकी झलक इन नेताओं के चयन से समझा जा सकता है।

RJD के खिलाफ मजबूत वोट बैंक बनाने की तैयारी में BJP
बिहार में करीब पिछले डेढ़ दशक से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) भले ही सत्ता से बाहर है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राज्य का मजबूत और बड़ा वोट बैंक अभी भी इस पार्टी के साथ जुड़ा है। बीजेपी ये भली-भांति समझती है कि अगर बिहार में लंबे समय तक राजनीति में टिकना है तो आरजेडी के समांतर वोटबैंक तैयार करना होगा। इसी कड़ी में वैश्य समाज से आने वाले ताराकिशोर प्रसाद, रेणु देवी, संजय जासवाल को पद देने का फैसला लिया गया है।

पहली नजर में तो यही लगता है कि करीब आठ फीसदी वोट बैंक वाले वैश्य समाज के इतने लोगों को बीजेपी इतने बड़े-बड़े पदों पर क्यों बैठा रही है, लेकिन आप अगर बिहार की जाति व्यवस्था के अंदर जाकर झाकेंगे तो समझ पाएंगे कि संघ से संचालित इस पार्टी की कितनी दूर की प्लानिंग है।

वैश्य समाज में कई जातियों को सम्मलित करने की चल रही तैयारी
बिहार में बीजेपी एक नई जातिय समीकरण बनाने की तैयारी में जुटी है। कई गैर राजनीतिक संगठन मिलकर वैश्य समाज का एक मजबूत वोट बैंक एकजुट करने में जुटे हैं। वैश्य समाज के नामपर करीब 28 जाति और उपजाति के लोगों को लामबंद करने की तैयारी चल रही है। खास बात यह है कि इसमें अनुसूचित कैटेगरी में गिने जाने वाले बुनकर जाति के साथ उच्च जाति में गिने जाने वाले मारवाड़ी समाज के लोगों को भी वैश्य समाज में गिना जा रहा है।

वैश्य चेतना समिति के अध्यक्ष सुंदर साहू ने बताया कि इस समाज के तहत बिहार में 28 जातियों को एकजुट किया जा रहा है। इसमें कलवार, जायसवाल, रौनियार, तैलिक, कानू, हलवाई, शौण्डिक, चौरसिया, स्वर्णकार, वर्णवाल, पटवा, अग्रवाल, केशवरवानी, माहूरी, कुम्भकार, पोद्दार, अग्रहरी, कसेरा, मालाकार, नागर, लहेरी, तिल्ली, खटिक, लोहार, बढ़ई, सिन्दुरिया जैसी जातियों को गिना जाता है। माजूदा कानून व्यवस्था में ये जातियां ओबीसी, ईबीसी, एससी और उच्च कैटेगरी में आती हैं, लेकिन वर्ण व्यवस्था के दौर में ये सभी वैश्य ही थे। कोशिश की जा रही है कि अगर ये जातियां राजनीतिक रूप से एकजुटता दिखाती हैं तो पूरे समाज का ज्यादा भला हो सकता है।

जीत की गारंटी देता है वैश्य समाज
इस साल के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन और एनडीए ने मिलकर 34 वैश्य प्रत्याशियों को टिकट दिया था, जिसमें से 24 ने जीत दर्ज की है। गौर करने वाली बात यह हे कि बीजेपी ने 16 वैश्य प्रत्याशियों को टिकट दिया, जिसमें से 15 ने जीत दर्ज की है। मुजफ्फरपुर का केवल कुढ़नी ऐसी विधानसभा सीट है जहां एनडीए के वैश्य प्रत्याशी की हार हुई है। वैश्य समाज के लोगों का कहना है कि अगर बीजेपी भागलपुर, आरा समेत कई और जिलों में अगर इस समाज के लोगों को प्रत्याशी बनाती तो सफलता मिलने की संभावना थी।

लालू यादव की पार्टी भी वैश्य समाज को अपने साथ करने की कर चुकी है कोशिश
आरजेडी के राज्यसभा सांसद राजनीति प्रसाद नालंदा जिले से आते हैं और पेशे से वकील भी हैं। राजनीति प्रसाद हमेशा कोशिश में रहे कि वह वैश्य समाज की 30 जातियों को एकजुट करके आरजेडी के साथ जोडें। हालांकि वह इसमें अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं। वैश्य समाज के लोग बताते हैं कि लालू प्रसाद और उनके परिवार की सरकार में वैश्य समाज को सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया। इस वजह से उस पार्टी पर समाज का भरोसा कायम नहीं हो पा रहा है। इसी बात को ध्यान में रखकर बीजेपी वैश्य समाज को अपने साथ लामबंद करने की कोशिश में है।

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