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रविवार, अक्टूबर 17, 2021

असदुद्दीन औवैसी की पार्टी AIMIM ने बढ़ाई यूपीके सियासी दलों की चिंताएं, पूर्वांचल के कई जिलों में औवैसी की पार्टी की गहरी पैठ

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बिहार चुनाव में महागठबंधन के सत्ता हासिल करने के मंसूबों पर पानी फेरने वाली असदुद्दीन औवैसी की पार्टी AIMIM ने अब यूपी में सियासी दलों की चिंताएं बढ़ा दी है। चिंता का का कारण आजमगढ़ सहित पूर्वांचल के कई जिलों में ओवैसी की पार्टी की गहरी पैठ है, जिसके आधार पर ओवैसी ने अब यूपी में भी चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है। इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भांपते हुए पूर्व में सत्ता में रहते समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ओवैसी को आजमगढ़ और आसपास के जिलों से दूर रखने की पूरी कोशिश की थी। अब बिहार में जीत के बाद एआईएमआईएम के नेता और कार्यकर्ता काफी उत्साहित हैं और माना जा रहा है कि ओवैसी का अगला सियासी रण यूपी में होगा।

बता दें कि ओवैसी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही यूपी खासतौर पर पूर्वांचल में पांव पसारने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश के शासन काल के दौरान आजमगढ़ के निजामाबाद थाना क्षेत्र के खोदादादपुर में हुए सांप्रदायिक दंगा रहा हो अथवा मुस्लिम उत्पीड़न के अन्य मामले ओवैसी ने सत्ता के खिलाफ संघर्ष की कोशिश की। इस दौरान असदुद्दीन यूपी आना तो चाहे लेकिन उन्हें आजमगढ़ आने की अनुमति नहीं मिली।

वर्ष 2016 में तो आजमगढ़ आने के लिए ओवैसी की पार्टी और सत्तापक्ष के बीच जमकर विवाद भी हुआ था। अब बिहार में पांच सीट जीतने के बाद ओवैसी ने खुद यूपी और पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके है। ऐसे में उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता उत्साह से लबरेज नजर आ रहे है। चर्चा इस बात की होने लगी है कि बिहार में महागठबंधन की गणित खराब कर एनडीए की सत्ता में मददगार साबित हुए ओवैसी यूपी में चुनाव को कितना प्रभावित करेंगे?

पूर्वांचल के कई इलाकों में है ओवैसी की पार्टी का प्रभाव
अगर राजनीतिक प्रभाव पर नजर डालें तो ओवैसी की एआईएमआईएम संगठनात्मक रूप से आजमगढ़ और आसपास के जिलों में काफी मजबूत है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ओवैसी के सामने आने के बाद मुस्लिम मतदाता उनके साथ खड़ा हो सकता है। इसका सीधा नुकसान एसपी, बीएसपी को उठाना पड़ सकता है। कारण कि दोनों ही दल बिना मुस्लिम मतदाताओं का साथ मिले आज तक सत्ता हासिल करने में सफल नहीं हुए हैं।
वहीं मुस्लिम वोटों के बिखराव का फायदा सीधे तौर पर बीजेपी को मिलना तय है।

खास नेता को जिम्मेदारी सौंप सकते हैं ओवैसी
माना जा रहा है कि ओवैसी अपने सबसे खास नेता प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को चुनाव तैयारियों को लेकर बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकते है। शौकत मूलरूप से आजमगढ़ के रहने वाले है। इसका भी असर चुनाव पर पड़ेगा। ओवैसी के चुनाव लड़ने का सर्वाधिक असर पूर्वांचल के आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर, देवरिया जिले में पड़ सकता है। आजमगढ़ में दस विधानसभा सीटों में से मुबारकपुर, निजामाबाद, फूलपुर पवई और दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 22 से 24 प्रतिशत है। यहां किसी भी दल के हार और जीत में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

बीएसपी को कई सीटों पर हो सकता है नुकसान
मुबारकपुर से बीएसपी के शाह आलम विधायक है। इनकी हार जीत का अंतर 2000 से कम मतों का रहा है। वहीं दीदारगंज सीट पर बीएसपी के कद्दावर नेता पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर काबिज हैं। वर्ष 2012 में एसपी ने यहां मुस्लिम प्रत्याशी उतार बड़ी आसानी से यह सीट जीती थी। इसी तरह मऊ सदर व मोहम्मदाबाद सीट को मुस्लिम मतदाता सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।

आजमगढ़ के पड़ोसी जिलों में भी दिखेगा प्रभाव?
जौनपुर में दो सीटों का यही हाल है जो आजमगढ़ सीमा से सटी लगी हुई है। देवरिया में पीस पार्टी के कमजोर होने का फायदा भी ओवैसी को मिल सकता है। इसके अलावा गाजीपुर में मुख्तार परिवार के वर्चश्व कम होने का लाभ ओवैसी को मिलता दिख सकता है। ऐसे में एसपी-बीएसपी की बेचैनी जायज लग रही है। आम मतदाता भी यह मानने लगा है कि अगर ओवैसी चुनाव लड़ते हैं तो 2017 व 2019 की तरह 2022 में भी विपक्ष की राह आसान होने वाली नहीं है।

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