भगवान की साधना के ये सबसे आसान तरीके

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भगवत गीता के अध्याय 9, श्लोक 14 में भगवान कृष्ण कहते हैं कि नित्य मेरे नाम और महिमा का जाप करते हुए, मेरी प्राप्ति के लिए प्रयास करते हुए और बार-बार मुझे प्रणाम करते हुए, दृढ़ संकल्प वाले वे भक्त, जो ध्यान के माध्यम से मुझसे जुड़े हैं, भक्ति के साथ मेरी पूजा करते हैं। हम सभी जानते हैं कि व्यावहारिक रूप से हमेशा नाम जप करने से भक्ति व्यक्त करना संभव नहीं है। श्रीमद्भागवतम् भक्ति या नवविधा भक्ति के उन रूपों को बताते हैं, जिसके नियमित अभ्यास से साधक भगवान के करीब पहुंचता है।

इस भक्ति के नौ रूप हैं- श्रवणम्, यानी भगवान के नाम और महिमा को सुनना। कीर्तनम्, यानी भगवान की महानता का गायन। स्मरणम्, यानी बार-बार भगवान को याद करना। पाद सेवनम्, यानी भगवान के चरणों की सेवा करना। अर्चनम्, यानी अनुष्ठानिक परंपराओं के साथ भगवान की पूजा करना। वंदनम्, यानी भगवान के प्रति श्रद्धा रखना। दास्यम्, यानी भगवान को उनके सेवक के रूप में सेवा देना। साख्यम्, यानी भगवान को अपना मित्र मानना और आत्म-निवेदनम् या स्वयं को भूल भगवान के साथ एक होकर पूर्ण समर्पण कर देना। इन सभी रूपों में कीर्तनम् भक्ति का एक लोकप्रिय रूप है, जिसमें भक्तिपूर्ण उत्साह के साथ भगवान की महिमा को सुनाना, जप करना और उन्हें याद करना शामिल है। इरादा मन को ईश्वर पर स्थिर करना है।

कभी-कभी भक्त ध्यान के अभ्यास या मंत्र जाप में सो जाते हैं। ऐसे भक्तों के लिए कीर्तनम् पूजा ही एक सक्रिय विधि है, जो उन्हें जागृत और जागरूक रख सकती है। इस प्रकार का जोरदार गायन और नाम जप अन्य ध्यान भंग करने वाली आवाजों को भी रोकता है। कीर्तनम् में अनेक प्रकार के गीत और मंत्र हैं, जो मन को एक रोचक विविधता प्रदान करते हैं। जप की प्रबलता से दिव्य स्पंदन उत्पन्न होता है, जो वातावरण को शुभ बनाता है।

कीर्तनम् आम तौर पर बड़े समूहों में किया जाता है, इसलिए इसमें सामूहिक भागीदारी की भी ऊर्जा होती है, जो विश्वास को बढ़ाती है। यही कारण है कि भारत में कई महान संतों ने कीर्तनम् को भक्ति का एक लोकप्रिय रूप माना। मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास, तुकाराम और एकनाथ जैसे भक्तिरस संतों ने भक्ति काव्य की रचना की, जिसकी सहायता से भगवान के नाम का जाप किया जा सकता है। भगवान के प्रति दैनिक भक्ति भी खुद को उन गतिविधियों में शामिल करके व्यक्त की जा सकती है, जो भगवान की महिमा बढ़ाते हैं। वास्तव में, हम जो कुछ भी करते हैं, उसका परिणाम भगवान को अर्पित करके उसे एक भक्ति गतिविधि में बदल सकते हैं।

भगवान के प्रति समर्पित हर गतिविधि अनन्य भक्ति अभ्यास में बदल सकती है। जो लोग इस तरह से भक्ति का अभ्यास करते हैं, वे सुबह जल्दी उठते हैं और साधना, प्रार्थना, योग साधना और ध्यान में जुट जाते हैं। वे अपना सारा समय जागने से लेकर सोने तक ईश्वर और उन साथी प्राणियों की सेवा में लगाने की कोशिश करते हैं, जिनमें वे ईश्वर को देखते हैं। दूसरों के साथ उनके व्यवहार में भगवान के प्रति उनकी भक्ति दिखाई देती है। वे सभी प्राणियों के लिए शांतिपूर्ण, दयालु, सहनशील और मैत्रीपूर्ण होते हैं। वे सभी में परमात्मा की उपस्थिति देखते हैं। जाहिर है उन्हें पूजा के लिए अतिरिक्त कर्मकांड की जरूरत नहीं होती। वे किसी भव्य मंदिर में या अपने स्वयं के घर में समान भक्तिपूर्ण भाव से पूजा करते हैं।