कैसे बना गांव का छोरा पहले रोमांटिक और फिर भारत कुमार? मनोज कुमार स्पेशल

मनोज कुमार ने अपने कॅरियर की शुरुआत एक रोमांटिक नायक के रूप में की थी और बाद के वर्षों में देशभक्ति फिल्मों के वे निर्विवाद नायक के रूप में स्थापित हो गए। 24 जुलाई यानी आज ही के दिन अबोटाबाद (अब पाकिस्तान में स्थित) में 1937 में जन्मे मनोज को उनके माता-पिता ने हरिकिशन गिर गोस्वामी नाम दिया था। बाद में फिल्मों में उन्होंने मनोज को नाम के रूप में अपनाया। फिल्म बिरादरी में उन्हें ‘पंडित जी’ के नाम से जाना जाता है और मीडिया ने उन्हें ‘भारत कुमार’ के रूप में संबोधित किया।

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वे अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान हैं। 1947 में वे अपने दो माह के भाई और मां के साथ अस्पताल में थे। उसी समय दंगे भड़क गए। अस्पताल का पूरा स्टॉफ मरीजों को छोड़कर भाग गया। इस अफरातफरी में उनके नवजात भाई की मृत्यु हो गई। लेकिन यह समय शोक मनाने का नहीं था, क्योंकि परिवार को तुरंत भारत विस्थापित होना था। दिल्ली में वे काफी दिनों तक शरणार्थी शिविर में रहे। दिल्ली से ही उन्होंने अपना स्नातक किया।

ऐसा कहा जाता है कि एक दिन मनोज कुमार एक फिल्म स्टूडियो में टहल रहे थे। उन्होंने वहां एक सज्जन व्यक्ति से काम मांगा तो प्रोडक्शन ने उन्हें रोशनी और अन्य सामान ढोने के काम में लगा दिया। धीरे-धीरे वे सेट पर सहायक के रूप में पदोन्नत हो गए। उन्हें फिर नायक के लिए प्रकाश व्यवस्था की जांच करने के वास्ते स्टेपनी के रूप में खड़ा किया जाने लगा। तभी अचानक किसी के दिमाग में उन्हें फिल्म में कोई भूमिका देने के बारे में ख्याल आया होगा तो केवल 20 साल की उम्र में उन्होंने ‘फैशन’ फिल्म से कॅरियर की शुरुआत की। आने वाले चार वर्षों में मनोज कुमार ने आठ फिल्में (पंचायत, सहारा, चांद, हनीमून, सुहाग, सिंदूर, कांच की गुड़िया और रेशमी रुमाल) कीं। ज्यादातर नायिका प्रधान फिल्में थीं और असफल रहीं। सफलता की शुरुआत हुई विजय भट्ट की ‘हरियाली और रास्ता’ से।

साठ के दशक तक आते-आते वे एक स्थापित स्टार बन गए थे। उन्होंने 27 फिल्मों में अभिनय किया। इनमें कुछ रोमांटिक फिल्में थीं, जैसे डॉ विद्या, दो बदन, सावन की घटा, पत्थर के सनम और आदमी। कुछ सामाजिक थीं, जैसे हिमालय की गोद में तो कुछ थ्रिलर जैसे वो कौन थी, गुमनाम और अनीता। 1965 में उन्होंने अपनी पहली देशभक्ति फिल्म ‘शहीद-ए-भगत’ की,