अब एक महीने तक नहीं होगा कोई भी मांगलिक कार्य, 15 दिसंबर से धनुर्मास

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पंचांग के अनुसार 15 दिसंबर को सूर्य वृश्चिक राशि की यात्रा को समाप्त करते हुए धनु राशि में प्रवेश करेंगे. धनु राशि में सूर्य देव का प्रवेश धनु संक्रांति कहलाती है. धर्मशास्त्र के मनीषियों के अनुसार धनु राशि में सूर्य गोचर धनुर्मास कहलाता है. धनुर्मास के एक माह तक शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, भूमि पूजन आदि मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित सुरेश श्रीमाली के अनुसार हिन्दू धर्म ग्रंथों में धनुर्मास का महीना धर्म आराधना व तीर्थाटन के लिए अति महत्वपूर्ण माना गया है. प्राकृतिक दृष्टि कोण से धनुर्मास में हिमपात, शीतलहर, ठंड का बदला हुआ प्रभाव दृष्टिगत होता है. जो कि धार्मिक क्रिया कलापों की दृष्टिकोण से बेहद शुभ होता है.

धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस समय धर्म, तपस्या तथा आराधना के हिसाब से मनुष्य की परीक्षा होती है. धनु संक्रांति के परिभ्रमण काल में भक्त सनातन धर्म का पालन करते हुए अनवरत भगवत भजन करते हैं और अपनी साधना एवं उपासना को आगे बढ़ाते हैं. मान्यता है कि इससे भक्तों को आदित्य लोक की प्राप्ति होती है.

पौष मास सूर्योपासना के लिए है अति विशिष्ट
हिंदू धर्म में पौष मास सूर्योपासना के लिए विशेष महत्त्व वाला होता है. मान्यता है कि इस मास में स्नान आदि करके सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य देने से हर कामना पूरी होती है. शरीर स्वस्थ होता है. शौर्य और तेज का विकास होता है. धनु संक्रांति पौष मास में ही पड़ती है. इस लिए पौष मास में सूर्य की आराधना विशेष बताई गई है.

देवगुरु बृहस्पति की राशि है धनु
ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक, देवगुरु बृहस्पति के स्वामित्व वाली राशि धनु में जब सूर्य देव गोचर करते हैं तो वह धर्म, आध्यात्म व संस्कृति से जुड़े नवीन काल खंड का निर्माण होता है. ऐसी परिस्थितियों में भगवत भजन, कथा श्रवण तथा तीर्थ यात्रा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है.

मकर संक्रांति के बाद बजेगी शहनाई
सूर्य देव करीब एक माह धनु राशि में संचरण करने के बाद 15 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो मकर संक्रांति होगी. इसके बाद सभी शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जायेंगे.